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शनिवार, 18 मई 2013

सबकुछ बिकता है संसार में जैसा हो

खूब सजा के रख बाजार में जैसा हो.
सबकुछ बिकता है संसार में जैसा हो.

पूजा की थाली में रक्खा जाता है
तुलसी का पत्ता आकार में जैसा हो.

उससे निस्बत रखनी है तो रखनी है
मिलने-जुलने बात विचार में जैसा हो.

घर की मुर्गी दाल बराबर होती है
मोल भले उसका बाजार में जैसा हो.

दिन के उजाले में मासूम ही दिखता है
उसका चेहरा अंधकार में जैसा हो.

उसपर कोई आंच नहीं आने देना
घर का बच्चा है व्यवहार में जैसा हो.

--देवेंद्र गौतम

मंगलवार, 14 मई 2013

वो अपने आठ पहर में से दोपहर ही दे

हवा के दोश पे उड़ता हुआ शरर ही दे.
वो कुछ न दे तो तमाजत का इक सफर ही दे

वो मौज दे नहीं सकता, न दे, भंवर ही दे.
करीब आके ये किस्सा तमाम कर ही दे.

न अपना हाल बताये, न मेरा हाल सुने
न अपने ठौर ठिकाने की कुछ खबर ही दे.

मेरे रुके हुए कदमों का वास्ता है तुझे
जहां पे लोग भटकते हैं वो डगर ही दे.

मैं पूरे दिन पे कभी हक नहीं जताउंगा
वो अपने आठ पहर में से दोपहर ही दे.

मेरी उमीद का गुलशन उजड़ नहीं पाये
हरेक बीज के अंदर कोई शजर ही दे.

अब उसकी सल्तनत में सर कहां छुपाये हम
हमें न रहने दे फुटपाथ पे न घर ही दे.

मैं उससे चांद सितारे तो नहीं मांगूंगा
बस एक बार इनायत भरी नजर ही दे.

--देवेंद्र गौतम



शनिवार, 11 मई 2013

किसी खुदा का हमें कोई डर नहीं होता

उसे कहीं भी भटकने का डर नहीं होता.
वो जिसके साथ कोई राहबर नहीं होता.

हम इस जहां में फकत आदमी से डरते हैं
किसी खुदा का हमें कोई डर नहीं होता.

न जाने कौन सी मिट्टी के बने होते हैं
किसी की बात का जिनपे असर नहीं होता

हरेक शख्स में इंसानियत नहीं होती
हरेक शख्स मगर जानवर नहीं होता.

वहां किसी पे भरोसा भी हो तो कैसे हो
खुद अपना साया जहां मोतबर नहीं होता.

न जाने कैसे दुआयें कुबूल होती हैं
मेरी दुआ का जरा भी असर नहीं होता.

कहीं पे कुछ तो हुआ है जो ऐसा आलम है
इतना वीरान तो कोई नगर नहीं होता.

----देवेंद्र गौतम

शनिवार, 4 मई 2013

कौन कमबख्त मुस्कुराता है


दर्द को तह-ब-तह सजाता है.
कौन कमबख्त मुस्कुराता है.

और सबलोग बच निकलते हैं
डूबने वाला डूब जाता है.

उसकी हिम्मत तो देखिये साहब!
आंधियों में दिये जलाता है.

शाम ढलने के बाद ये सूरज
अपना चेहरा कहां छुपाता है.

नींद आंखों से दूर होती है
जब भी सपना कोई दिखाता है.

लोग दूरी बना के मिलते हैं
कौन दिल के करीब आता है.

तीन पत्तों को सामने रखकर
कौन तकदीर आजमाता है?

---देवेंद्र गौतम

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

हर तरफ कागज के फूलों की नुमाइश हो रही है


मौसमों की आजकल हमपर नवाजिश हो रही है.
रोज आंधी आ रही है, रोज बारिश हो रही है.

रात-दिन सपने दिखाये जा रहे हैं हम सभी को
बैठे-बैठे आस्मां छूने की कोशिश हो रही है.

शक के घेरे में पड़ोसी भी हैं लेकिन दरहकी़कत
घर के अंदर घर जला देने की साजिश हो रही है.

मौत भी क्या-क्या तमाशे कर रही है जा ब जा अब
जिन्दगी की हर कदम पर आजमाइश हो रही है.

जंगलों में आजकल इन्सान देखे जा रहे हैं
और शहरों में दरिंदों की रहाइश हो रही है.

अब यहां कुदरत की खुश्बू की कोई कीमत नहीं है
हर तरफ कागज के फूलों की नुमाइश हो रही है.

---देवेंद्र गौतम

रविवार, 21 अप्रैल 2013

वो दूर बैठ के कठपुतलियां नचाते हैं

उबाल खाते हैं फिर बर्फ सा जम जाते हैं.
ये लोग जंगे-मुसलसल कहां चलाते हैं.

हम इंकलाब के नारे बहुत लगाते हैं.
फिर अपने-अपने घरौंदे में लौट आते हैं.

किसी के सामने खुलकर कभी नहीं आते
वो दूर बैठ के कठपुतलियां नचाते हैं.

किसी की शक्ल को पहचानता नहीं कोई
तमाम लोग नक़ाबों में पाये जाते हैं.

अजीब रंग के खा़ना-बदोश हैं हम भी
जहां जगह मिली चादर वहीं बिछाते हैं.

अंधेरे घर पे किसी की नजर नहीं जाती
सब आफताब के आगे दीया जलाते हैं.

नज़र-नवाज़ नजारे नज़र नहीं आते
हमारी आंख के परदे भी झिलमिलाते हैं.

---देवेंद्र गौतम

रविवार, 7 अप्रैल 2013

कत्ता

हवा की जद में इक भटका हुआ लश्कर निकल आया

धुआं चिमनी में कालिख छोड़कर बाहर निकल आया.

तुम्हारा जी भी हल्का हो गया शिकवा शिकायत से
हमारे दिल पे भी रक्खा हुआ पत्थर निकल आया.

---देवेंद्र गौतम

शनिवार, 30 मार्च 2013

मतलब निकालते रहो मेरे बयान का

चक्कर लगा के देख चुके आसमान का.
अब खौफ ही नहीं रहा अगली उड़ान का.

परछाइयों के बीच उसे ढूंढते हैं हम
शायद कोई वजूद हो वहमो-गुमान का.

मेरी हरेक बात में शामिल है और बात
मतलब निकालते रहो मेरे बयान का.

चारो तरफ है जाल बराबर बिछा हुआ
खतरा बना हुआ है परिंदे की जान का.

मुझमें सिमट के बैठ गया है जो एक शख्स
किरदार बन गया है मेरी दास्तान का.

बेचैनियों के बीच से होकर गुजर गया
इक पल अगर मिला भी कभी इत्मिनान का.

उसकी नजर गड़ी थी परिंदे की आंख पर
हर तीर था निशाने पर उसके कमान का.

दीवारे-दर को दे गया अपने तमाम अक्स
नक्शा बदल के रख दिया मेरे मकान का.

क्या जाने आज कौन सा मंजर दिखायी दे
बदला हुआ है रंग अभी आसमान का.

गौतम हमारी बात का गर तू बुरा न मान
हर लफ्ज़ आज बख्श दे अपनी जु़बान का.

--देवेंद्र गौतम



रविवार, 24 मार्च 2013

पूछें अगर वो नाम तो मजहब भी बोलना

अपनी हरेक बात का मतलब भी बोलना.
लहज़ा बदल के बोलना तुम जब भी बोलना.

उनकी हरेक हां में मिलानी पड़ेगी हां
वो दिन को शब कहें तो उसे शब भी बोलना.

ताकि किसी तरह की मलामत नहीं रहे
पूछें अगर वो नाम तो मजहब भी बोलना.

मैंने सभी की बात सुनी और चुप रहा
कुछ चाहते हैं आज मेरे लब भी बोलना.

बाबू को याद रहती नहीं है किसी की बात
कुछ बात भूल जाते हैं साहब भी बोलना.

हांलाकि मैं दिखा चुका हूं सच का आईना
वो चाहते नहीं हैं मगर अब भी बोलना.

---देवेंद्र गौतम

सोमवार, 18 मार्च 2013

बंद करिए किताब की बातें

कागजी इंकलाब की बातें.
बंद करिए किताब की बातें.

कितने अय्यार हैं जो करते हैं
हड्डियों से  कबाब की बातें.

पढ़ते रहते हैं हम रिसालों में
कैसे-कैसे अज़ाब की बातें.

नींद आखों से दूर होती है
जब निकलती हैं ख्वाब की बातें.

और थोड़ा करीब आते तो
खुल के होतीं हिज़ाब की बातें.

कौन सुनता है इस जमाने में
एक ख़ाना-खराब की बातें.

---देवेंद्र गौतम

रविवार, 10 मार्च 2013

चलते-चलते सूई घडी की रुक जाती है

दम लेने को एक ठिकाना ढूँढ रही है.
अपनी गाड़ी जाने कब से बेपटरी है.

हमने बांध लिया है सारी नदियों को
इसीलिए जीवन की नैया डूब रही है.

बस जायें जिस देस में लेकिन कुछ नस्लों तक
अपनी मिटटी की खुशबू बाकी रहती है.

बेमकसद परदेस की खाक नहीं छानी
हमने अपनी मिटटी की खुशबू बांटी है.

उन आंखों ने ख्वाब बहुत देखे होंगे
जिन आंखों में 'नीर भरी दुःख की बदली' है.

अपने दिल की धड़कन पर काबू रखना
चलते-चलते सूई घडी की रुक जाती है.

खून रगों में दौड़ रहा है कुछ ऐसे
जिस्म के अंदर जैसे एक नदी बहती है.

आवारा बादल मंडराते रहते हैं
धरती अपने मरकज़ पर कायम रहती है.

मतलब की दुनिया है गौतम, क्या समझे!
हर नेकी में पोशीदा थोड़ी सी बदी है.

---देवेंद्र गौतम



मंगलवार, 26 फरवरी 2013

जिंदगी भर जिंदगी को जिंदगी धिक्कारती

काढ लेती फन अचानक और बस फुफकारती.
जिंदगी की जंग बोलो किस तरह वो हारती.

देवता होते हैं कैसे हमने जाना ही नहीं
बस उतारे जा रहे हैं हर किसी की आरती.

अपना चेहरा ढांपकर मैं भी गुजर जाता मगर
जिंदगी भर जिंदगी को जिंदगी धिक्कारती.

सांस के धागों को हम मर्ज़ी से अपनी खैंचते
मौत आती भी अगर तो बेसबब झख मारती.

रात अंधेरे को अपनी गोद में लेती गयी
सुब्ह की किरनों को आखिर किसलिए पुचकारती

पूछ मुझसे किसके अंदर जज़्ब है कितनी जलन
मैं कि लेता आ रहा हूं हर दीये की आरती.

--देवेंद्र गौतम




रविवार, 24 फरवरी 2013

बस्तियां बसती गयीं और दफ़्न वीराने हुए

                           कत्ता    
अपनी बातें गौर से सुनने की जिद ठाने हुए.
बीच रस्ते में खड़े हैं रस्सियां ताने हुए.
माजरा क्या है हमें कोई बताता ही नहीं
कौन हैं ये लोग? न जाने, न पहचाने हुए.
              
               ग़ज़ल 
इस ज़मीं पे आजतक जितने भी मयखाने हुए.
जिंदगी को देखने के उतने पैमाने हुए.

लोग कहते हैं यहां ऐसे भी दीवाने हुए.
दर्दो-गम जिनके लिए उल्फत के नजराने हुए.

रोज जिनकी राह में शमए जलाती थी हवा
रोज अंगारों से खेले ऐसे परवाने हुए.

एक जंगल था यहां पर दूर तक फैला हुआ
बस्तियां बसती गयीं और दफ़्न वीराने हुए.

रंग गिरगिट का बदल जाता है मौसम देखकर
वो कभी अपने भी थे? जो आज बेगाने हुए.

आजतक लेकिन न मिल पाया कभी अपना सुराग
मंजिलें जानी हुई, रस्ते भी पहचाने हुए.

---देवेंद्र गौतम

शनिवार, 23 फरवरी 2013

कितने घर बर्बाद रहे

जितनी भी तादाद रहे.
असली मुद्दा याद रहे.

ऊपर से गांधीवादी
अंदर से ज़ल्लाद रहे.

घूर के देखा, जेल गए
क़त्ल किया, आज़ाद रहे.

इतनी जंजीरों में रहकर
हम कैसे आज़ाद रहे.

जबतक तेरा साथ रहा
शाद रहे,आबाद रहे.

 गांव उजड़ते हैं तो उजडें
शह्र मगर आबाद रहे.

पांच साल में लौटेंगे
इनका चेहरा याद रहे.

कुछ हम सबको हासिल हो
कुछ हम सबके बाद रहे.

एक बंजारन के चक्कर में
कितने घर बर्बाद रहे.

---देवेंद्र गौतम

मंगलवार, 12 फरवरी 2013

वरक़ जिंदगी का पलटकर रहेंगे

(गज़लगंगा की 150  वीं पोस्ट)

जुनूं की बिसातें उलटकर रहेंगे.
हम अहले-खिरद से निपटकर रहेंगे.

पता है कि खुद में सिमटकर रहेंगे.
हम अपनी जड़ों से भी कटकर रहेंगे.

ये पंजे बड़े तेज़ हैं इनसे बचना
ये दुनिया की हर शै झपटकर रहेंगे.

भले आग लग जाये सारे नगर में
हम अपने घरों में सिमटकर रहेंगे.

लिखेंगे कहानी नयी मंजिलों की
वरक़ जिंदगी का पलटकर रहेंगे.

कभी तो हमारी ज़रूरत पड़ेगी
वो कितने दिनों हमसे कटकर रहेंगे.

भुला देंगे यादें गये मौसमों की
हवाओं से कितना लिपटकर रहेंगे.

वतन पर बढ़ेंगे अभी और खतरे
अगर हम कबीलों में बंटकर रहेंगे.

ख़ुशी के बहाने तलाशेंगे गौतम
गमे -जिंदगी से सलटकर रहेंगे.

---देवेंद्र गौतम



रविवार, 27 जनवरी 2013

धीरे-धीरे कट रहा है हर नफ़स का तार क्यों

धीरे-धीरे कट रहा है हर नफ़स का तार क्यों.
जिंदगी से हम सभी हैं इस कदर बेजार क्यों.

हम खरीदारों पे आखिर ये नवाजिश किसलिए
घर के दरवाज़े तलक आने लगा बाज़ार क्यों.

दूध के अंदर किसी ने ज़ह्र तो डाला ही था
यक-ब-यक बच्चे भला पड़ने लगे बीमार क्यों.

धूप में तपती नहीं धरती जहां इक रोज भी
रात दिन बारिश वहां होती है मुसलाधार क्यों.

बात कुछ तो है यकीनन आप चाहे जो कहें
आज कुछ बदला हुआ है आपका व्यवहार क्यों.

पांव रखने को ज़मी कम पड़ रही है, सोचिये
यूं खिसकता जा रहा है आपका आधार क्यों.

---देवेंद्र गौतम


शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

वक़्त भागा जा रहा था और हम ठहरे हुए थे


गर्दिशे-हालात की जंजीर से जकड़े हुए थे.
वक़्त भागा जा रहा था और हम ठहरे हुए थे.

नींद आती थी मगर उसमें कोई लज्ज़त नहीं थी
ख्वाब जाने कौन से ताबूत में सोये हुए थे.

इक शगूफा छोड़कर कोई वहां से चल दिया था
और हम आपस में कितनी देर तक  उलझे हुए थे.

ज़ेहनो-दिल में एक बेचैनी सी थी छायी  हुयी
रात का अंतिम पहर था और हम जागे हुए थे.

और फिर साबित हुआ हमपे कि धरती गोल है
जब अचानक मिल गए वे लोग जो बिछड़े हुए थे.

उम्र के इस मोड़ पर कोई सुधर सकता है क्या
लोग कहते हैं कि हम बचपन के ही बिगड़े हुए थे.

---देवेंद्र गौतम

बुधवार, 28 नवम्बर 2012

काटने लगता है अपना ही मकां शाम के बाद

यूं  तेरी यादों की कश्ती है रवां शाम के बाद.
जैसे वीरान जज़ीरे में धुआं शाम के बाद.

चंद लम्हे जो तेरे साथ गुजारे थे  कभी
ढूंढ़ता हूं उन्हीं लम्हों के निशां शाम के बाद.

एक-एक करके हरेक जख्म उभर आता है
दिल के जज़्बात भी होते हैं जवां शाम के बाद.

कभी माज़ी कभी फर्दा की कसक उठती है
काटने लगता है अपना ही मकां शाम के बाद.

बारहा दिन में उभर आता है तारों का निजाम
बारहा सुब्ह का होता है  गुमां शाम के बाद.

मेरे होठों पे बहरहाल खमोशी ही रही
लोग कहते हैं कि खुलती है ज़बां शाम के बाद.

----देवेंद्र गौतम

मंगलवार, 20 नवम्बर 2012

हम डूबते सूरज की इबादत नहीं करते

कितना भी लाल पीला हो सोहबत नहीं करते.
हम डूबते सूरज की इबादत नहीं करते.

इस दर्ज़ा तो ऐ दोस्त! हिमाक़त नहीं करते.
सूरज से जुगनुओं की तिजारत नहीं करते.

इतना दबे हुए हैं किताबों के बोझ से
इस दौर के बच्चे भी शरारत नहीं करते.

रह जाते हैं सब खूबियां अपनी समेटकर
जो लोग अपने फन की तिजारत नहीं करते.

जो लोग आप लिखते हैं किस्मत की इबारत
हांथों की लकीरों की शिकायत नहीं करते.

बागी जिन्हें समझती है दुनिया वो दरअसल
मिल-बांट के खाते हैं बगावत नहीं करते.

फिर क्यों न मानते वो हमारी हरेक बात
हम कर के दिखाते हैं नसीहत नहीं करते.

----देवेंद्र गौतम

शुक्रवार, 16 नवम्बर 2012

उठते-उठते उठता है तूफ़ान कोई

हैवानों की बस्ती में इंसान कोई.
भूले भटके आ पहुंचा नादान कोई.

कहां गए वो कव्वे जो बतलाते थे
घर में आनेवाला है मेहमान कोई.

जाने क्यों जाना-पहचाना लगता है
जब भी मिलता है मुझको अनजान कोई.

इस तर्ह बेचैन है अपना मन जैसे
दरिया की तह में उठता तूफ़ान कोई.

अपनी जेब टटोल के देखो क्या कुछ है
घटा हुआ है फिर घर में सामान कोई.

धीरे-धीरे गर्मी सर पे चढ़ती है
उठते-उठते उठता है तूफ़ान कोई.

कितना मुश्किल होता है पूरा करना
काम अगर मिल जाता है आसान कोई.

सबसे कटकर जीना कोई जीना है
मिल-जुल कर रहने में है अपमान कोई?

उसके आगे मर्ज़ी किसकी चलती है
किस्मत से भी होता है बलवान कोई?

--देवेंद्र गौतम



बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

जाने अपना तन कहां है मन कहां

वो खुला माहौल वो जीवन कहां
घर तो है घर में मगर आंगन कहां..

हर तअल्लुक एक जरूरत की कड़ी
आज कच्चे धागों का बंधन कहां.

मन के अन्दर विष भी है अमृत भी है
इस समंदर का मगर मंथन कहां.

हमने माना पेड़ लगवाए बहुत
नीम,बरगद, साल और चंदन कहां.

सोच का मर्कज़ कहीं दिखता नहीं
जाने अपना तन कहां है, मन कहां.

मौसमों के कह्र से राहत नहीं
जेठ है, बैसाख है, सावन कहां.

हर बरस पुतले जलाते रह गए
आजतक लेकिन जला रावण कहां.

----देवेंद्र गौतम